Product Description
‘दलित लेखन दलित ही कर सकता है’ को पारंपरिक सोच के ही नहीं, प्रगतिशील कहे जाने वाले आलोचकों ने भी संकीर्णता से लिया है । दलित-विमर्श साहित्य में व्याप्त छदम को उघाड़ रहा है । साहित्य में जो भी अनुभव आते हैं वे सर्वभौमिक और शास्वत नहीं होते । इन सन्दर्भों में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियां दलित. . . Read More
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‘दलित लेखन दलित ही कर सकता है’ को पारंपरिक सोच के ही नहीं, प्रगतिशील कहे जाने वाले आलोचकों ने भी संकीर्णता से लिया है । दलित-विमर्श साहित्य में व्याप्त छदम को उघाड़ रहा है । साहित्य में जो भी अनुभव आते हैं वे सर्वभौमिक और शास्वत नहीं होते । इन सन्दर्भों में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियां दलित. . . Read More
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